मन – दरिया
मन दरिया को देख कहे
तू कुछ - कुछ मेरे जैसा है
तू तनहा ही हुँकार भरे,
मै स्व ही स्व से बात करूँ।
तू पल में ही संहार करे
मैं क्रांतियों का दाता हूँ।
शैलाव तेरे पट से झलके
तल तेरा धीरजमय है
मै कितना विचलित दिखता हूँ
ये मै जानूँ , मैं शीतल हूँ।
तू दुनिया का विष पीता है
खुद को मथता रहता है
तपता है , सिहरता है
जग को बारिश देता है
दोष ज़हर का सहता है।
हवा से हलचल है मुझमें
वैचारिक मंथन रहता है
भाव हिलोरे सहकर भी
राह सत्य बताता हूँ
जग बुद्धि पर चलता है
पर कहता , मन बेचैन करे।
कुछ मेरी ये विवशता है
कुछ तेरी भी सीमाएँ हैं
तू कुछ - कुछ मेरे जैसा है
मैं कुछ - कुछ तेरे जैसा हूँ ।
रूचि शुकला




