"प्रारब्ध से प्रारम्भ" 2005 से 2015 के दौरान लिखी गईं मेरी कविताओं का संग्रह है।मन का मर्म स्पर्श इन भाव प्रधान कविताओं की मुख्य विशेषता है।कई कविताओं में दर्शन की झलक देखने को मिलती है। "मेरी कविता कुछ नहीं, आत्मा के बोल हैं। प्रारब्ध; लिखता गया, जज़्बात को गढ़ता गया, आज अर्पण आपको, आरम्भ ये प्रारम्भ है।" मेरा प्रारब्ध पुनः चरितार्थ हो इसी आशा के साथ, रूचि शुक्ला
Friday, 20 February 2015
बुढ़िया की सीख
बुढ़िया की सीख
बुढ़िया मुझसे बोली यूँ
अब तक समझा, कहती हूँ
नेकी कर, नेकी के हद में
कर्ण बन कुण्डल न देना
तू अच्छी है तू जानेगी
दुनिया इसको न मानेगी
जग की खातिर मर जाएगी
तू कितना भी कर जाएगी
फिर भी उसमें गुन्जाइश है
इतना तो तू सुन जाएगी
हँसना है तो हँस लेना
रोना है तो रो लेना
जीवन तेरा अपना है
कुछ पल खुद को जी लेना
दुनियादारी रिश्ते नाते,
साथ सभी के रहते हैं
भव सागर के घेरे से,
सच्चा मोती चुन लेना
तू बस एक अकेली है
बाकी सब रंग रेली है
कर्म ही तेरा अपना है
और वक्त का फेरा है।
रूचि शुक्ला
बुढ़िया मुझसे बोली यूँ
अब तक समझा, कहती हूँ
नेकी कर, नेकी के हद में
कर्ण बन कुण्डल न देना
तू अच्छी है तू जानेगी
दुनिया इसको न मानेगी
जग की खातिर मर जाएगी
तू कितना भी कर जाएगी
फिर भी उसमें गुन्जाइश है
इतना तो तू सुन जाएगी
हँसना है तो हँस लेना
रोना है तो रो लेना
जीवन तेरा अपना है
कुछ पल खुद को जी लेना
दुनियादारी रिश्ते नाते,
साथ सभी के रहते हैं
भव सागर के घेरे से,
सच्चा मोती चुन लेना
तू बस एक अकेली है
बाकी सब रंग रेली है
कर्म ही तेरा अपना है
और वक्त का फेरा है।
रूचि शुक्ला
अदा से चलो
अदा से चलो
अदा से चलो तुम जुदा हो बनी
बदल भी गयी कुछ घड़ी के लिये
सच को ये कैसे झुठलाओगी
है पहचान तेरी तुझसे बनी
क्या इसको ही तुम बदल जाओगी
जैसी भी हो तुम वैसी रहो
सच को जियो वही है सही
चाँद की पहचान है चाँदनी
दुल्हन का शर्मीलापन देख लो
ये सब अदा की ही बात है
तुम भी जियो, अपनी पहचान से
लोगों के कहने में जो आ गई
पहचान खुद को ही न पाओगी
अपने ही बोल जो सचकर दीये
क्षितिज पर तुम दमक जाओगी
संसार की तो क्या बात है ?
सागर सी मिठास ले पाओगी।
रूचि शुक्ला
अदा से चलो तुम जुदा हो बनी
बदल भी गयी कुछ घड़ी के लिये
सच को ये कैसे झुठलाओगी
है पहचान तेरी तुझसे बनी
क्या इसको ही तुम बदल जाओगी
जैसी भी हो तुम वैसी रहो
सच को जियो वही है सही
चाँद की पहचान है चाँदनी
दुल्हन का शर्मीलापन देख लो
ये सब अदा की ही बात है
तुम भी जियो, अपनी पहचान से
लोगों के कहने में जो आ गई
पहचान खुद को ही न पाओगी
अपने ही बोल जो सचकर दीये
क्षितिज पर तुम दमक जाओगी
संसार की तो क्या बात है ?
सागर सी मिठास ले पाओगी।
रूचि शुक्ला
आशीष
आशीष
जीवन के फंदे बुनते – बुनते
एक सपना बुन डाला था
सात फेरों में ही मैने
जीवन चल डाला था
परिणय़ – बंधन में बंध के
जीवन का सच जाना था
दिल से निकले शब्दों से
मैं आज इबारत लिखती हूँ
प्यार में जीने मरने की
रोज़ कहानी सुनती थी
आज मेरा जीवन ही
उसकी साँसों से चलता है
प्यार ही सच्चा शिवमय बंधन
अहसास उसी ने करवाया
अपनी आदत से वो लेकिन
बाज कभी न आता है
मेरे आँसू आने तक
मुझको झुंझलाता है
लड़ते लड़ते थक जाती हूँ
पर प्यार उसी से करती हूँ
उसको खाँसी भी आए तो
साँसे मेरी थमती हैं
अब तक खुद को जीती थी
अब मैं उसको जीती हूँ
हाँ मैं उसकी पत्नी हूँ
मेरे लिए आशीष है वो।
रूचि शुक्ला
जीवन के फंदे बुनते – बुनते
एक सपना बुन डाला था
सात फेरों में ही मैने
जीवन चल डाला था
परिणय़ – बंधन में बंध के
जीवन का सच जाना था
दिल से निकले शब्दों से
मैं आज इबारत लिखती हूँ
प्यार में जीने मरने की
रोज़ कहानी सुनती थी
आज मेरा जीवन ही
उसकी साँसों से चलता है
प्यार ही सच्चा शिवमय बंधन
अहसास उसी ने करवाया
अपनी आदत से वो लेकिन
बाज कभी न आता है
मेरे आँसू आने तक
मुझको झुंझलाता है
लड़ते लड़ते थक जाती हूँ
पर प्यार उसी से करती हूँ
उसको खाँसी भी आए तो
साँसे मेरी थमती हैं
अब तक खुद को जीती थी
अब मैं उसको जीती हूँ
हाँ मैं उसकी पत्नी हूँ
मेरे लिए आशीष है वो।
रूचि शुक्ला
इतना बुरा नहीं इन्सान
इतना बुरा नहीं इन्सान
कर्मयुगी संसार
पथपथ हाहाकार
भृष्टाचार , पापाचार
लोभ भोग बाजार
सूख गया आखों का पानी
कैसा ये खुमार
हिंसा, चोरी लूटपाट से
सना हुआ अखबार
मुझे बता , क्या बुरा है इतना
पूरा ये संसार
यदि नहीं तो क्यों करता है
बस इसका दीदार
मूल्यों के कुछ मोती डाल
सजा प्रेम का थाल
हर बच्चा खाने वाला है
नैतिकता का ग्रास
जो बोएगा , वो पाएगा
बाँध पते की गाँठ
जितना मुझे दिखा रहा तू
इतना बुरा नहीं संसार।
रूचि शुक्ला
कर्मयुगी संसार
पथपथ हाहाकार
भृष्टाचार , पापाचार
लोभ भोग बाजार
सूख गया आखों का पानी
कैसा ये खुमार
हिंसा, चोरी लूटपाट से
सना हुआ अखबार
मुझे बता , क्या बुरा है इतना
पूरा ये संसार
यदि नहीं तो क्यों करता है
बस इसका दीदार
मूल्यों के कुछ मोती डाल
सजा प्रेम का थाल
हर बच्चा खाने वाला है
नैतिकता का ग्रास
जो बोएगा , वो पाएगा
बाँध पते की गाँठ
जितना मुझे दिखा रहा तू
इतना बुरा नहीं संसार।
रूचि शुक्ला
कैद पंछी
कैद पंछी
स्वछंद आकाश के विचरण से दूर
पिंजरे की गोलाई नापता पंछी
थके मालिक की आवाज़ पर सीटी बजाता
कुछ दानों के लिए मोहताज़ पंछी
सूनी आँखों से आकाश को निहारता
लहलहाती डालियों को याद करता
एक खुशहाल घोसले का अरमान लिए
पिंजरे की ओट से झाँकता पंछी
भाषा की दीवार लेकिन प्रेम और विश्वास खोजता पंछी
सुरों में संगीत पर निःशब्दता उसमें
विचारहीन , कल के इंतजार में
एक उड़ान के लिए बेचैन पंछी।
रूचि शुक्ला
स्वछंद आकाश के विचरण से दूर
पिंजरे की गोलाई नापता पंछी
थके मालिक की आवाज़ पर सीटी बजाता
कुछ दानों के लिए मोहताज़ पंछी
सूनी आँखों से आकाश को निहारता
लहलहाती डालियों को याद करता
एक खुशहाल घोसले का अरमान लिए
पिंजरे की ओट से झाँकता पंछी
भाषा की दीवार लेकिन प्रेम और विश्वास खोजता पंछी
सुरों में संगीत पर निःशब्दता उसमें
विचारहीन , कल के इंतजार में
एक उड़ान के लिए बेचैन पंछी।
रूचि शुक्ला
Thursday, 19 February 2015
इन्सान
इन्सान
ज़मीं से फलक पर उठती ए हवा
शरद की ठंडी पवन या
लू का थपेड़ा
बहुआयामी
रेत के टीले बनाती
कभी चमन को बसाती
चुरा के खुशबू खुद को सजाती
पत्तों के सहारे हँसती - हँसाती
स्व ही स्व से लड़ती
आवाज़ की गुंजन के साथ
तूफां से घिरती
ऐ हवा , पानी में लकीर खींचना
बादलों को घुमाना
दिशा के साथ रुख
समा के साथ रंग बदलना
तेरा धीरज कहें या इन्सानी फितरत
पर तू सही है
इस जहाँ का सुर यही है।
रूचि शुक्ला
ज़मीं से फलक पर उठती ए हवा
शरद की ठंडी पवन या
लू का थपेड़ा
बहुआयामी
रेत के टीले बनाती
कभी चमन को बसाती
चुरा के खुशबू खुद को सजाती
पत्तों के सहारे हँसती - हँसाती
स्व ही स्व से लड़ती
आवाज़ की गुंजन के साथ
तूफां से घिरती
ऐ हवा , पानी में लकीर खींचना
बादलों को घुमाना
दिशा के साथ रुख
समा के साथ रंग बदलना
तेरा धीरज कहें या इन्सानी फितरत
पर तू सही है
इस जहाँ का सुर यही है।
रूचि शुक्ला
Wednesday, 18 February 2015
बुलंदी तेरी है
बुलंदी तेरी है
ताज़गी तुझसे है
हर वक्त नया है
एक झनकार दे
संगीत बनता है
खिलखिलाते मन से
खुशियाँ हैं सारी
नज़रिये से तेरे
रुख़ बदलता है
बंद घड़ी से
क्या वक्त थमता है ?
आगोश में खुशबू रुका नहीं करती
खुशी की चमक छिपा नहीं करती
ज़िंदगी दे, प्रभु ने उम्मीद बाँधी थी
उस आस को थामे राह संवारे चल
पथिक है , तो राह में मोड़ भी होंगे
तू चालाक है अच्छा , प्रमाण तो लेंगे
चलना है तुझको , ये तेरी गति है
हौसला भर , आगे तेरी बुलंदी है।
रूचि शुक्ला
ताज़गी तुझसे है
हर वक्त नया है
एक झनकार दे
संगीत बनता है
खिलखिलाते मन से
खुशियाँ हैं सारी
नज़रिये से तेरे
रुख़ बदलता है
बंद घड़ी से
क्या वक्त थमता है ?
आगोश में खुशबू रुका नहीं करती
खुशी की चमक छिपा नहीं करती
ज़िंदगी दे, प्रभु ने उम्मीद बाँधी थी
उस आस को थामे राह संवारे चल
पथिक है , तो राह में मोड़ भी होंगे
तू चालाक है अच्छा , प्रमाण तो लेंगे
चलना है तुझको , ये तेरी गति है
हौसला भर , आगे तेरी बुलंदी है।
रूचि शुक्ला
दीवारें मौन नहीं
दीवारें मौन नहीं
दीवारें मौन नहीं
आवाज़ लगाती हैं
देखो वो आवाज़
फिर लौट आती है
तुम जो करते हो
वही पाते हो
यह अहसास दिलाती है
बरसात में छतरी की आस लिये
जो राह तकते हो
किसी का साथ दोगे
तभी संग पाओगे
दो कदम चल कर ना लौटो
ऋतुएँ चौमास बदलेंगी
हर मास के फल का अपना मज़ा है
कभी आम तो कभी केला भला है
आगोश में अपनी ये लम्हें न छिपाओ
एक हाथ ये बढ़ा है
एक हाथ तुम बढ़ाओ।
रूचि शुक्ला
नन्हा प्यारा ख़्वाब
नन्हा प्यारा ख़्वाब
हाथ में कलम है
मन में है ख्याल
आज कुछ लिखूँ मैं
हो शब्दों का एक जाल।
साथ नहीं देता पर
मन चंचल है आज
गोद में हो मेरे नन्हा प्यारा ख्वाब।
सुकोमल और सुरमयी
छोटी सी है आस
घर मेरे भी खेले
किल्कारी का राग।
छुई–मुई , छुई-मुई ऐसा हो
मीठा सा रसगुल्ला
नन्हें पाँव दौडें मेरे घर के अंगना।
बचपन , अब फिर लौटे
उसके संग सहारे
हंस कर देखे , प्यार करे
नन्हें हाथ पसारे
उंगली को जो पकड़े
छोड़े नहीं छुड़ावे
O'God ये कर दो,छोटा सा करिश्मा
अब जल्दी हो पूरा, देखा है जो सपना।
रूचि शुक्ला
हाथ में कलम है
मन में है ख्याल
आज कुछ लिखूँ मैं
हो शब्दों का एक जाल।
साथ नहीं देता पर
मन चंचल है आज
गोद में हो मेरे नन्हा प्यारा ख्वाब।
सुकोमल और सुरमयी
छोटी सी है आस
घर मेरे भी खेले
किल्कारी का राग।
छुई–मुई , छुई-मुई ऐसा हो
मीठा सा रसगुल्ला
नन्हें पाँव दौडें मेरे घर के अंगना।
बचपन , अब फिर लौटे
उसके संग सहारे
हंस कर देखे , प्यार करे
नन्हें हाथ पसारे
उंगली को जो पकड़े
छोड़े नहीं छुड़ावे
O'God ये कर दो,छोटा सा करिश्मा
अब जल्दी हो पूरा, देखा है जो सपना।
रूचि शुक्ला
Tuesday, 17 February 2015
बहुत दूर जाना है
बहुत दूर जाना है
सच प्रारब्ध ही प्रारम्भ का बिन्दु है।
हर घनेरी रात
नए दिन की ओर पग बढती
कहती है, न रुको
अभी बाकी है जिंदगी।
जहाँ लगता है
ख़त्म हो चूका है ये जहाँ
वहीं से एक नई दुनिया
शुरू होती है।
आकाश में कोई गूंज नहीं
पर झनकार के लीये आकाश चाहिये।
नई इबारत वही पुराने शब्द लिखते हैं
पके हुए फल का बीज फिर गुलजार होता है
ठहरा हुआ समुद्र, फिर बून्द से शुरुआत करता है
आवाज़ पहचान लो अपनी, बहुत दूर जाना है।
रूचि शुक्ला
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