“कुछ लिखो”
श्याम निलय के चिर पर
दुग्ध चांदनी बिखरी
जैसे सुप्त चेतना में
विस्मृत यादें थिरकीं
सीरा सी मुह में घुलती
होले होले से मुस्काती
मृदुल याद वो मुझसे कहती
क्यों बचपन को भूली
नव बाला के हांथों से
क्या आज रागनी रूठी
प्रतिध्वनित करती मानों
कवि ह्रदय की बोली
अबोध बनी बैठी हूँ जैसे
मैं लिखना न जानूँ
आज कलम उठ खड़ी कहे
आ तुझको डंडा मारूँ
क्यों कुन्दित बुद्धि कर खुद की
मानस - सुषमा बाँध रही है
मन पृष्ठ के भाव हिलोरे
अलसाई क्यों थाम रही है
ले कलम हांथों में अपने
गलबाँह डाल कोरे कागज़ के
अंकित कर बिसरी भूली सब
लिखती जा पन्ने दर पन्ने।
रुचि शुक्ला
श्याम निलय के चिर पर
दुग्ध चांदनी बिखरी
जैसे सुप्त चेतना में
विस्मृत यादें थिरकीं
सीरा सी मुह में घुलती
होले होले से मुस्काती
मृदुल याद वो मुझसे कहती
क्यों बचपन को भूली
नव बाला के हांथों से
क्या आज रागनी रूठी
प्रतिध्वनित करती मानों
कवि ह्रदय की बोली
अबोध बनी बैठी हूँ जैसे
मैं लिखना न जानूँ
आज कलम उठ खड़ी कहे
आ तुझको डंडा मारूँ
क्यों कुन्दित बुद्धि कर खुद की
मानस - सुषमा बाँध रही है
मन पृष्ठ के भाव हिलोरे
अलसाई क्यों थाम रही है
ले कलम हांथों में अपने
गलबाँह डाल कोरे कागज़ के
अंकित कर बिसरी भूली सब
लिखती जा पन्ने दर पन्ने।
रुचि शुक्ला

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