धूल की कीमत
पैर देख कर रोता क्यों
मधुर ध्वनित बाँसुरी कहती
बाँस खोखला मेरा क्यों
अगर बाँसुरी सरगम सुनती
मोर देखता पंखों को
फिर क्या इसमें शक था बाकी
इठलाते वो किस्मत को
तेरी भीनी खुशबु की ही
महक छिपी इस कुटिया में
ऐ पुष्प तू रोता क्यों
देख चंद इन काँटों को
देखो कितनी खुशियाँ हैं
इस छोटी सी दुनिया में
तिल तिल करता इन्सा
पल मांगे दो जीने को
कितना ख़ास बना है तू
बात जान ले इतनी सी
धूल भले ही आम लगे
जग जाने पर कीमत को।
रूचि शुक्ला

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