“तेरा साथ”
चंचल चपल किरण
मदमाती मस्ती में
इंद्रधनुष बन खिलती
मेघों की बस्ती में।
कठिन डगर हो जितनी
राही उतना तपता
कुंदन भी बनता जब
अग्नि को है सहता।
तेरा साथ मुझे है
सारस के साथी सा
निष्ठुर उलझन कैसी
हम राह बना तुझ जिसे।
अंधियारी कोठर में
शिशिर किरण की वर्षा
एक झरोखा ही तो
राह किरण को देता।
मदमाती डाली से
रूककर मैने पूछा
अलबेली सी क्यों तू
झूम रही है नभ में।
उसने सहसा थामकर
जड़ को शीश नवाया
इसका साथ मुझे है
कारण यही खुशी का।
याद प्रफुल्लित कर मैं
मंद - मंद मुस्काई
पुंज - प्रकाश सा तू
आया इस जीवन में।
शिवजी की कृपा से
आशीष मिला है मुझको
श्रद्धा शीश झुकाए
हूँ शुक्रगुजार हरपल मैं।
रुचि शुक्ला
चंचल चपल किरण
मदमाती मस्ती में
इंद्रधनुष बन खिलती
मेघों की बस्ती में।
कठिन डगर हो जितनी
राही उतना तपता
कुंदन भी बनता जब
अग्नि को है सहता।
तेरा साथ मुझे है
सारस के साथी सा
निष्ठुर उलझन कैसी
हम राह बना तुझ जिसे।
अंधियारी कोठर में
शिशिर किरण की वर्षा
एक झरोखा ही तो
राह किरण को देता।
मदमाती डाली से
रूककर मैने पूछा
अलबेली सी क्यों तू
झूम रही है नभ में।
उसने सहसा थामकर
जड़ को शीश नवाया
इसका साथ मुझे है
कारण यही खुशी का।
याद प्रफुल्लित कर मैं
मंद - मंद मुस्काई
पुंज - प्रकाश सा तू
आया इस जीवन में।
शिवजी की कृपा से
आशीष मिला है मुझको
श्रद्धा शीश झुकाए
हूँ शुक्रगुजार हरपल मैं।
रुचि शुक्ला

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