मूल्य और हम
भाव, मूल्य, निःस्वार्थता पर
कपट वार चलते रहे
हर दिन ऐसा लगा
शून्य ये हो जाएँगे
सच का परिक्षण किस कदर
हर बाल मन हैरान है
क्या चुनू शीर्ष पर
भृष्ट हर आचार है
त्याग महिमा जान कर
मैं अगर चल भी दिया
निष्काम, धिक्कारता का
पात्र बन रह जाऊँगा
मन मेरे संकोच है
शेष किन्तु प्रश्न है
भाव, मूल्य, त्याग बिन
कैसे ये अस्तित्व है।
रूचि शुक्ला
भाव, मूल्य, निःस्वार्थता पर
कपट वार चलते रहे
हर दिन ऐसा लगा
शून्य ये हो जाएँगे
सच का परिक्षण किस कदर
हर बाल मन हैरान है
क्या चुनू शीर्ष पर
भृष्ट हर आचार है
त्याग महिमा जान कर
मैं अगर चल भी दिया
निष्काम, धिक्कारता का
पात्र बन रह जाऊँगा
मन मेरे संकोच है
शेष किन्तु प्रश्न है
भाव, मूल्य, त्याग बिन
कैसे ये अस्तित्व है।
रूचि शुक्ला
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