“कसक”
मस्तिष्क में सैलाव
मन अधीर बेचैन क्यों
गति की रफ्तार देख
आज मैं हैरान यूँ
कुछ पल बहल भी जाऊँ तो
ये कसक जज़्बात में
कब करोगी काम पूरा
पल नहीं हैं हाथ में
अस्तित्व का कारण है कुछ
ज्ञात भी, अज्ञात भी
झूठ का संसार छोड़
सच वही जो शेष है
कर्म करने की ललक
सीखने का मोह भी
लक्ष्य क्या, है मोक्ष क्या
उत्तर अभी ये शेष है ।
रूचि शुक्ला
मस्तिष्क में सैलाव
मन अधीर बेचैन क्यों
गति की रफ्तार देख
आज मैं हैरान यूँ
कुछ पल बहल भी जाऊँ तो
ये कसक जज़्बात में
कब करोगी काम पूरा
पल नहीं हैं हाथ में
अस्तित्व का कारण है कुछ
ज्ञात भी, अज्ञात भी
झूठ का संसार छोड़
सच वही जो शेष है
कर्म करने की ललक
सीखने का मोह भी
लक्ष्य क्या, है मोक्ष क्या
उत्तर अभी ये शेष है ।
रूचि शुक्ला

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