बहुत दूर जाना है
सच प्रारब्ध ही प्रारम्भ का बिन्दु है।
हर घनेरी रात
नए दिन की ओर पग बढती
कहती है, न रुको
अभी बाकी है जिंदगी।
जहाँ लगता है
ख़त्म हो चूका है ये जहाँ
वहीं से एक नई दुनिया
शुरू होती है।
आकाश में कोई गूंज नहीं
पर झनकार के लीये आकाश चाहिये।
नई इबारत वही पुराने शब्द लिखते हैं
पके हुए फल का बीज फिर गुलजार होता है
ठहरा हुआ समुद्र, फिर बून्द से शुरुआत करता है
आवाज़ पहचान लो अपनी, बहुत दूर जाना है।
रूचि शुक्ला
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