आशीष
जीवन के फंदे बुनते – बुनते
एक सपना बुन डाला था
सात फेरों में ही मैने
जीवन चल डाला था
परिणय़ – बंधन में बंध के
जीवन का सच जाना था
दिल से निकले शब्दों से
मैं आज इबारत लिखती हूँ
प्यार में जीने मरने की
रोज़ कहानी सुनती थी
आज मेरा जीवन ही
उसकी साँसों से चलता है
प्यार ही सच्चा शिवमय बंधन
अहसास उसी ने करवाया
अपनी आदत से वो लेकिन
बाज कभी न आता है
मेरे आँसू आने तक
मुझको झुंझलाता है
लड़ते लड़ते थक जाती हूँ
पर प्यार उसी से करती हूँ
उसको खाँसी भी आए तो
साँसे मेरी थमती हैं
अब तक खुद को जीती थी
अब मैं उसको जीती हूँ
हाँ मैं उसकी पत्नी हूँ
मेरे लिए आशीष है वो।
रूचि शुक्ला
जीवन के फंदे बुनते – बुनते
एक सपना बुन डाला था
सात फेरों में ही मैने
जीवन चल डाला था
परिणय़ – बंधन में बंध के
जीवन का सच जाना था
दिल से निकले शब्दों से
मैं आज इबारत लिखती हूँ
प्यार में जीने मरने की
रोज़ कहानी सुनती थी
आज मेरा जीवन ही
उसकी साँसों से चलता है
प्यार ही सच्चा शिवमय बंधन
अहसास उसी ने करवाया
अपनी आदत से वो लेकिन
बाज कभी न आता है
मेरे आँसू आने तक
मुझको झुंझलाता है
लड़ते लड़ते थक जाती हूँ
पर प्यार उसी से करती हूँ
उसको खाँसी भी आए तो
साँसे मेरी थमती हैं
अब तक खुद को जीती थी
अब मैं उसको जीती हूँ
हाँ मैं उसकी पत्नी हूँ
मेरे लिए आशीष है वो।
रूचि शुक्ला
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