बुढ़िया की सीख
बुढ़िया मुझसे बोली यूँ
अब तक समझा, कहती हूँ
नेकी कर, नेकी के हद में
कर्ण बन कुण्डल न देना
तू अच्छी है तू जानेगी
दुनिया इसको न मानेगी
जग की खातिर मर जाएगी
तू कितना भी कर जाएगी
फिर भी उसमें गुन्जाइश है
इतना तो तू सुन जाएगी
हँसना है तो हँस लेना
रोना है तो रो लेना
जीवन तेरा अपना है
कुछ पल खुद को जी लेना
दुनियादारी रिश्ते नाते,
साथ सभी के रहते हैं
भव सागर के घेरे से,
सच्चा मोती चुन लेना
तू बस एक अकेली है
बाकी सब रंग रेली है
कर्म ही तेरा अपना है
और वक्त का फेरा है।
रूचि शुक्ला
बुढ़िया मुझसे बोली यूँ
अब तक समझा, कहती हूँ
नेकी कर, नेकी के हद में
कर्ण बन कुण्डल न देना
तू अच्छी है तू जानेगी
दुनिया इसको न मानेगी
जग की खातिर मर जाएगी
तू कितना भी कर जाएगी
फिर भी उसमें गुन्जाइश है
इतना तो तू सुन जाएगी
हँसना है तो हँस लेना
रोना है तो रो लेना
जीवन तेरा अपना है
कुछ पल खुद को जी लेना
दुनियादारी रिश्ते नाते,
साथ सभी के रहते हैं
भव सागर के घेरे से,
सच्चा मोती चुन लेना
तू बस एक अकेली है
बाकी सब रंग रेली है
कर्म ही तेरा अपना है
और वक्त का फेरा है।
रूचि शुक्ला
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