दीवारें मौन नहीं
दीवारें मौन नहीं
आवाज़ लगाती हैं
देखो वो आवाज़
फिर लौट आती है
तुम जो करते हो
वही पाते हो
यह अहसास दिलाती है
बरसात में छतरी की आस लिये
जो राह तकते हो
किसी का साथ दोगे
तभी संग पाओगे
दो कदम चल कर ना लौटो
ऋतुएँ चौमास बदलेंगी
हर मास के फल का अपना मज़ा है
कभी आम तो कभी केला भला है
आगोश में अपनी ये लम्हें न छिपाओ
एक हाथ ये बढ़ा है
एक हाथ तुम बढ़ाओ।
रूचि शुक्ला
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