इतना बुरा नहीं इन्सान
कर्मयुगी संसार
पथपथ हाहाकार
भृष्टाचार , पापाचार
लोभ भोग बाजार
सूख गया आखों का पानी
कैसा ये खुमार
हिंसा, चोरी लूटपाट से
सना हुआ अखबार
मुझे बता , क्या बुरा है इतना
पूरा ये संसार
यदि नहीं तो क्यों करता है
बस इसका दीदार
मूल्यों के कुछ मोती डाल
सजा प्रेम का थाल
हर बच्चा खाने वाला है
नैतिकता का ग्रास
जो बोएगा , वो पाएगा
बाँध पते की गाँठ
जितना मुझे दिखा रहा तू
इतना बुरा नहीं संसार।
रूचि शुक्ला
कर्मयुगी संसार
पथपथ हाहाकार
भृष्टाचार , पापाचार
लोभ भोग बाजार
सूख गया आखों का पानी
कैसा ये खुमार
हिंसा, चोरी लूटपाट से
सना हुआ अखबार
मुझे बता , क्या बुरा है इतना
पूरा ये संसार
यदि नहीं तो क्यों करता है
बस इसका दीदार
मूल्यों के कुछ मोती डाल
सजा प्रेम का थाल
हर बच्चा खाने वाला है
नैतिकता का ग्रास
जो बोएगा , वो पाएगा
बाँध पते की गाँठ
जितना मुझे दिखा रहा तू
इतना बुरा नहीं संसार।
रूचि शुक्ला
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