इन्सान
ज़मीं से फलक पर उठती ए हवा
शरद की ठंडी पवन या
लू का थपेड़ा
बहुआयामी
रेत के टीले बनाती
कभी चमन को बसाती
चुरा के खुशबू खुद को सजाती
पत्तों के सहारे हँसती - हँसाती
स्व ही स्व से लड़ती
आवाज़ की गुंजन के साथ
तूफां से घिरती
ऐ हवा , पानी में लकीर खींचना
बादलों को घुमाना
दिशा के साथ रुख
समा के साथ रंग बदलना
तेरा धीरज कहें या इन्सानी फितरत
पर तू सही है
इस जहाँ का सुर यही है।
रूचि शुक्ला
ज़मीं से फलक पर उठती ए हवा
शरद की ठंडी पवन या
लू का थपेड़ा
बहुआयामी
रेत के टीले बनाती
कभी चमन को बसाती
चुरा के खुशबू खुद को सजाती
पत्तों के सहारे हँसती - हँसाती
स्व ही स्व से लड़ती
आवाज़ की गुंजन के साथ
तूफां से घिरती
ऐ हवा , पानी में लकीर खींचना
बादलों को घुमाना
दिशा के साथ रुख
समा के साथ रंग बदलना
तेरा धीरज कहें या इन्सानी फितरत
पर तू सही है
इस जहाँ का सुर यही है।
रूचि शुक्ला
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